माँ

माँ शब्द हमें जीवन के आखिरी पल में भी बच्चा होने का एहसास कराता है । जिसके प्यार भरे आँचल में बच्चा स्वयं को सबसे ज्यादा सुरक्षित महसूस करता है। माँ का साया बच्चे को दुख की हर धूप में छाया समान प्रतीत होता है । माँ हर दर्द सहकर भी बच्चे की इच्छा को पूरा करके सदा मुसकुराती है । बच्चा सिर्फ माँ का ही है ऐसा ही स्वीकारती है वह ।
यदि यह सत्य है तो यह भी जान लीजिए कि ऐसा करके आपने अपने ही बच्चे को कमजोर, डरपोक और जिद्दी बना दिया है। उसकी हर बात स्वीकार कर आपने अपने ही हाथों से अपने बच्चे के भविष्य को अंधकार से भर दिया है।
माँ तो बच्चे की प्रथम शिक्षक होती है। माँ अपने स्वरूप को पहचानो। आप ही सीता, कुंती, द्रोपदी, सुभद्रा, माता गुजरी, जीजाबाई और समस्त क्रांतिकारियों की माँ हो। जिन्होंने अपने बच्चों को स्नेह, दुलार के साथ-साथ वीर भी बनाया। भारतवर्ष का आने वाला कल अर्थात् अपने देश का भविष्य आने वाली पीढ़ी है और मिट्टी के बरतन रूपी पीढ़ी का कुम्हार कोई और नहीं, माँ आप ही हो। माँ जिस सांचे में डालेगी अपने बच्चे को, उसी के अनुसार बच्चे के चरित्र का निर्माण होगा। क्योंकि बच्चा माँ के साथ ही तो अधिक समय रहता है।
अतः बच्चे को प्यार कीजिए, खूब दुलार कीजिए लेकिन साथ ही यह भी ध्यान रखिए कि आप सिर्फ अपने बच्चे की ही नहीं देश की भी माता हैं, आपकी कोख से देश का भविष्य जन्म लेता है, इसलिये इसे सर्व गुण सम्पन्न बनाने का प्रयास कीजिए।
—– सारिका कौर